Sunday, January 31, 2021
Shakthi sambhritam
शक्तिसम्भृतम् युक्तिसम्भृतम् ।
शक्तियुक्तिसम्भृतं भवतु भारतम् ॥
शस्त्रधारकं शास्त्रधारकम् ।
शस्त्रशास्त्रधारकं भवतु भारतम् ॥
रीतिसंस्कृतं नीतिसंस्कृतम् ।
रीतिनीतिसंस्कृतम् भवतु भारतम् ॥
कर्मनैष्ठिकं धर्मनैष्ठिकम् ।
कर्मधर्मनैष्ठिकम् भवतु भारतम् ॥
भक्तिसाधकं मुक्तिसाधकम् ।
भक्तिमुक्तिसाधकं भवतु भारतम् ॥
मनसा सततं स्मरणीयं
मनसा सततं स्मरणीयं
वचसा सततं वदनीयं
लोकहितं मम करणीयम् ॥ लोकहितम् ॥
न भोगभवने रमणीयं
न च सुखशयने शयनीयम् ।
अहर्निशं जागरणीयं
लोकहितं मम करणीयम् ॥ १॥
न जातु दुःखं गणनीयं
न च निजसौख्यं मननीयम् ।
कार्यक्षेत्रे त्वरणीयं
लोकहितं मम करणीयम् ॥ २॥
दुःखसागरे तरणीयं
कष्टपर्वते चरणीयम् ।
विपत्तिविपिने भ्रमणीयं
लोकहितं मम करणीयम् ॥ ३॥
गहनारण्ये घनान्धकारे
बन्धुजना ये स्थिता गह्वरे ।
तत्र मया सञ्चरणीयं
लोकहितं मम करणीयम् ॥ ४॥
बनें हम धर्मके योगी, धरेंगे ध्यान संस्कृति का
बनें हम धर्मके योगी, धरेंगे ध्यान संस्कृति का
उठाकर धर्मका झंडा, करेंगे उत्थान संस्कृति का ।। धृ ||
गलेमें शीलकी माला, पहनकर ज्ञानकी कफनी
पकडकर त्यागका झंडा, रखेंगे मान संस्कृति का ||१||
जलकर कष्टकी होली, ऊठाकर ईष्तकी झोली
जमाकर संतकी टोली, करें ऊत्थान संस्कृति का ||२||
हमारे जन्मका सार्थक, हमारे मोक्षका साधन
हमारे स्वर्गका साधन, करें ऊत्थान संस्कृति का ||3||
गलेमें शीलकी माला, पहनकर ज्ञानकी कफनी
पकडकर त्यागका झंडा, रखेंगे मान संस्कृति का ||१||
जलकर कष्टकी होली, ऊठाकर ईष्तकी झोली
जमाकर संतकी टोली, करें ऊत्थान संस्कृति का ||२||
हमारे जन्मका सार्थक, हमारे मोक्षका साधन
हमारे स्वर्गका साधन, करें ऊत्थान संस्कृति का ||3||
दिव्य ध्येय की ओर तपस्वी जीवन भर अविचल चलता है ॥
दिव्य ध्येय की ओर तपस्वी जीवन भर अविचल चलता है ॥
सज धज कर आए आकर्षण पग पग पर झूमते प्रलोभन
हो कर सब से विमुख बटोही पथ पर संभल संभल बढता है ॥
अमर तत्व की अमिट साधना प्राणो मे उत्सर्ग कामना
जीवन का शाश्वत व्रत ले कर साधक हँस कण कण गलता है ॥
सफल विफल और आस निराशा इस की ओर कहाँ जिज्ञासा
बीहडता मे राह बनाता राही मचल मचल चलता है ॥
पतझड के झंझावातों मे जग के घातों प्रतिघातों मे
सुरभि लुटाता सुमन सिहरता निर्जनता मे भी खिलता है ॥
ग़लत मत कदम उठाओ,सोच कर चलो, विचार कर चलो,
ग़लत मत कदम उठाओ,सोच कर चलो, विचार कर चलो,
राह की मुसीबतों को पार कर चलो, पार कर चलो ॥ध्रु॥
हम पे जिम्मेदारियां हैं देश की बड़ी,
हम न बदलें अपनी चाल हर घड़ी-घड़ी ।
आग ले चलो, चिराग ले चलो,
ये मस्तियों के रंग भरे भाग ले चलो ॥१॥
मंजिल के मुसाफिर तुझे क्या राह की फ़िकर,
चट्टान पर तूफ़ान के झोंकों का क्या असर ।
ये कौन आ रहा, अन्धेरा छा रहा,
ये कौन मंजिलों पे मंजिलें उठा रहा ॥२॥
मिल के चलो एक साथ अब नहीं रुको,
बढ़ के चलो एक साथ अब नहीं झुको ।
साज़ करेगा, आवाज़ करेगा,
हमारी वीरता पे जहां नाज़ करेगा ॥३॥
ग़लत मत कदम उठाओ,
सोच कर चलो, विचार कर चलो,
राह की मुसीबतों को पार कर चलो, पार कर चलो ॥
हर देश में तू, हर वेश में तू
हर देश में तू, हर वेश में तू
तेरे नाम अनेक,तू एक ही है।
तेरी रंग भूमि यह विश्व धरा,
सब खेल और मेल में तू ही है।
सागर से उठा बादल बनके,
बादल से गिरा जल हो कर के।
वर्षा से बही, नदिया हो कर,
फ़िर जा के मिली,सागर बन कर,
मिट्टी से अणु ,परमाणु बना,
धरती ने रचा, पर्वत उपवन ।
सौंदर्य तेरा चहुँ, ओर दिखा,
कुछ और नहीं, बस तू ही दिखा ।
है रूप अलग, गुण धर्म अलग,
है मर्म अलग, हर कर्म अलग ।
पर एक है तू , यह दृष्टि मिली,
तेरे भिन्न प्रकार तू एक ही है ।
तेरी रंग भूमि यह विश्व धरा,
सब खेल और मेल में तू ही है।
सागर से उठा बादल बनके,
बादल से गिरा जल हो कर के।
वर्षा से बही, नदिया हो कर,
फ़िर जा के मिली,सागर बन कर,
मिट्टी से अणु ,परमाणु बना,
धरती ने रचा, पर्वत उपवन ।
सौंदर्य तेरा चहुँ, ओर दिखा,
कुछ और नहीं, बस तू ही दिखा ।
है रूप अलग, गुण धर्म अलग,
है मर्म अलग, हर कर्म अलग ।
पर एक है तू , यह दृष्टि मिली,
तेरे भिन्न प्रकार तू एक ही है ।
ध्येय मार्ग पर चले वीर तो
ध्येय मार्ग पर चले वीर तो
ध्येय मार्ग पर चले वीर तो पीछे अब न निहारो
हिम्मत कभी न हारो॥
तुम मनुष्य हो शक्ति तुम्हारे जीवन का संबल है
और तुम्हारा अतुलित साहस गिरी की भाँति अचल है
तो साथी केवल पल-भर को मोह-माया बिसारो॥
हिम्मत कभी न हारो ॥१॥
मत देखो कितनी दूरी है कितना लम्बा मग है
और न सोचो साथ तुम्हारे आज कहाँ तक जग है
लक्ष्य-प्राति की बलिवेदी पर अपना तन मन वारो
हिम्मत कभी न हारो ॥२॥
आज तुम्हारे साहस पर ही मुक्ति सुधा निर्भर है
आज तुम्हारे स्वर के साथी कोटि कंठ के स्वर है
तो साथी बढ़ चलो मार्ग पर आगे सदा निहारो॥
हिम्मत कभी न हारो ॥३॥
नवीन पर्व के लिए नवीन प्राण चाहीए।
नवीन पर्व के लिए नवीन प्राण चाहीए।
स्वतन्त्र देश हो गया प्रभुत्वमय दिशा मही
निशा कराल टल चली स्वतन्त्र माँ विभामयी
मुक्त मातृभूमि को नवीन मान चाहिए।
नवीन पर्व के लिए ॥१॥
चढ़ रहा निकेत है कि स्वर्ग छू गया सरल
दिशा-दिशा पुकारती कि साधना करो सफल
मुक्त गीत हो रहा नवी राग चाहिए
नवीन पर्व के लिए ॥२॥
युवकों कमर कसो कि कष्ट-कण्टकोंकी राह है
प्राण-दान का समय उमंग है उछाह है
पगों में आँधियाँ भरे प्रयाण-गान चाहिए।
नवीन पर्व के लिए ॥ ३॥
सबके लिए खुला हैं, मन्दिर यह हमारा...
सबके लिए खुला हैं, मन्दिर यह हमारा,मतभेद को भुला हैं, मन्दिर यह हमार,
आओ कोई भी पंथी, आओ कोई भी धर्मी,
देशी-विदेशीयों को, मन्दिर यह हमारा,
मैदान पट बिछाया, डाला है एक आसन,
सब देवता समाता, मन्दिर यह हमारा,
संतो की ऊंची वाणी, पढ़ते हैं मंत्र जिसमें,
सबका आवाज लेता, मन्दिर यह हमारा,
मानव का धर्म क्या हैं, मिलती हैं राह जिसमें,
चाहता भला सभी का, मन्दिर यह हमारा,
आओ सभी मिलेंगे, समुदाय प्रार्थना में,
तुकड्या कहे अमर हैं, मन्दिर यह हमारा,
Murta Maheshvara Stotram - Sri Vivekananda Giti Stotram
मूर्त-महेश्वरमुज्ज्वल-भास्करमिष्टममर-नर-वन्द्यम्।
वन्दे वेद-तनुमुज्झित-गर्हित-काञ्चन-कामिनी-बन्धम्॥१
कोटि-भानुकर-दीप्त-सिंहमहो कटि-तट-कौपिनवन्तम्।
अभीरभीर्हुङ्कार-नादित-दिङ्मुख-प्रचण्ड-ताण्डव-नृत्यम्॥२
भुक्ति-मुक्ति-कृपा-कटाक्ष-प्रेक्षणमघ-दल-विदलन-दक्षम्।
बाल-चन्द्र-धरमिन्दु-वन्द्यमिह नौमि गुरु-विवेकानन्दम्॥३
mūrta-maheśvaram ujjvala-bhāskaram
iṣṭam amara-nara-vandyam |
vande veda-tanum ujjhita-garhita-
kāñcana-kāminī-bandham || 1 ||
koṭi-bhānukara-dīpta-siṁham aho
kaṭi-taṭa-kaupina-vantam |
abhīr-abhīr-huṅkāra-nādita-diṅmukha-
pracaṇḍa-tāṇḍava-nṛtyam || 2 ||
bhukti-mukti-kṛpā-kaṭākṣa-prekṣaṇam
agha-dala-vidalana-dakṣam |
bāla-candra-dharam indu-vandyam iha
naumi guru-vivekānandam || 3 ||
Translation
Lord Siva incarnate, resplendent like the sun, adored by gods and men as their Chosen Ideal. The embodiment of the Vedas who has overcome the bondage of the much censured lust and gold.
Brilliant with the rays of a million suns, the lion among men, who has nothing but a loin cloth to wear. Who is dancing the violent dance of Siva, the quarters reverberate with the cry of “fear not, fear not”.
A mere compassionate glance of whose eyes is enough to impart both enjoyment and liberation, who tramples with ease the hordes of vice. Who is the veritable Siva with the crescent moon on the forehead, and who is worshipped by Indu. I bow to the guru, Vivekananda.
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